शनिवार, 12 जनवरी 2013

महंगाई का तड़का


सावधान-सावधान-सावधान..यूपीए टू की महंगाई मेल अपने समयानुसार चल रही है...इसकी रफ्तार और बढ़ने की पूरी संभावना है...इसलिए कृप्या ध्यान दें...इस मेल से राहत का इंतजार कर रहे यात्री बेकार ही उम्मीद लगाए बैठे है..क्योंकि इस मेल के रफ्तार के जरिए सरकार अपना खजाना भरने की उम्मीद लगाए बैठी है..और इस मेल के लिए उपयुक्त ड्राइवर भी सरकार को मिल गया है..और वो हैं पूर्व जस्टिस केलकर!

आम जनता महंगाई के बोझ तले दब रही है...दाल-रोटी के लिए पैसे-पैसे जोड़ते जोड़ते लोगों की कमर टूट रही है...लेकिन सरकार के माथे पर बल तक नहीं पड़ रहा है....कुछ दिनों पहले ही सरकार ने रेल भाड़ा बढ़ाने का ऐलान कर दिया है...और अब एलीपीजी और डीज़ल की बारी है...यूपीए सरकार पहले ही एलपीजी में लोगों को झटका दे सकती है...सरकार ने पहले रियायती सिलेंडरों की सख्या फिक्स की..और अब रियायती सिलेंडरों की कीमत भी बढ़ाने के लिए कमर कस ली है...सरकार के नए नियमों के मुताबिक अब साल में छह रियायती सिलेंडर ही मिलते हैं...और बाकी सिलेंडरों पर कई रियायत नहीं मिलती...उसे बाजार भाव पर खरीदना होता है...और अब सरकार रियायती सिलेंडरों पर भी कीमत बढ़ाने जा रही है....पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली ने इसका ऐलान कर दिया है...पेट्रोलियम मंत्री की माने पर प्रति सिलेंडर पचास से सौ रुपए तक का इजाफा किया जाता है....यानी इसकी सीधी मार आपकी रसोई पर पड़ेगी और या आप अपने रसोई के खर्चों में कटौती करेंगे
या फिर अपने रसोई का संतुलन बनाए रखने के लिए आपको अपनी जेब और ढीली करनी पड़ेगी..

एलपीजी तो आपके रसोई का बजट बिगाड़ने ही वाला है...तो डीज़ल ने भी आपके जेब जलाने की तैयारी कर ली है....आने वाले दिनों में जब आपको डीज़ल महंगा मिले तो आप चौंकिएगा मत...क्योंकि इसकी तैयारी अभी से कर ली गई है...पेट्रोलियम मंत्री की माने तो आने वले दिनों में डीज़ल की कीमतों में प्रति लीटर तीन रूपए तक का इजाफा हो सकता है

यानी एलपीजी के बाद रही सही कसर डीज़ल पूरी कर देगा..अगर डीज़ल की कीमतों में इजाफा होता है तो पहले ट्रांस्पोर्टेशन महंगा होगा...और इसके बाद फल फूल साग सब्जी समेत तमाम जरूरी चीजों की कीमतें बढ़ जाएंगी....और इसका चौतरफा मार आम आदमी को झेलना पड़ेगा.....

सरकार ने केलकर समीति की रिपोर्ट को पूरी तरह से लागू करने की योजना बना ली है....केलकर समिति ने अपनी रिपोर्ट में पेट्रोलियम पदार्थों की सब्सिडी कम करन की सिफारिश की थी...इतना ही नहीं प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री भी कह चुके हैं कि देश के खजाने पर सब्सिडी का बोझ बहुत ज्यादा है और इसे कम करने की जरूरत है..यानी साफ है क आने वाले दिनों में महंगाई के बोझ तले जनता की कमर औऱ भी झुकेगी..और हाल फिलहाल में इससे छुटकारा मिलने की कोई उम्मीद नहीं है



शनिवार, 5 जनवरी 2013

हर पल में खुश रहो...

ज़िंदगी को पल-पल जिओ और हर पल में खुश रहो
सुख हो दुख हो, तंगी हो मंदी हो हर पल को जिओ
खाने में मीठा ना मिले तो चीनी खाकर खुश रहो
घूमने को गाड़ी नहीं, तो बस में सफर कर खुश रहो
ठंड ज्यादा हो तो ठिठुरते हुए जिंदगी का नया मज़ा लो
दोस्तों से मिलने का वक्त नहीं तो फोन कर के खुश रहो
फोन को पैसे नहीं, को ऑफिस से चैट कर खुश रहो
लैप टॉप और टैब ना मिले तो डेस्कटॉप से काम चलाओ
टीवी एलईडी और एलसीडी नहीं तो ब्लैक-एंड व्हाइट में ही खुश रहो
खाने को पनीर ना मिले तो दाल रोटी में ही खश रहो
बीते हुए पल की मीठी यादों में ही खुश रहो
कुछ काम नहीं है तो टाइम पास कर के ही खुश रहो
आने वाले पल का पता नहीं, सपनों में ही खुश रहो
हंसते-हंसते ये पल बीत जाएंगे, वर्तमान में ही खुश रहो
जिंदगी को पल जिओ और हर पल में खुश रहो

                                                    
                                                         (प्रभाकर चंचल)

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

‘मुझे’ ज़िंदा रखना!

 'वीरा' को याद रखना

वो वीरा, वो दामिनी, वो अनामिका और वो निर्भया पूरे देश ने उसे नया नाम दिया, और पीड़ा की वक्त में उसके साथ खड़ा रहा। आज वो हमारे लिए किसी सीख से कम नहीं है और उसका संघर्ष किसी क्रांति से कम नहीं। दिल्ली में हुए गैंग रेप की इस पीड़ित छात्रा ने अस्पताल के बेड पर आईसीयू और वेंटीलेटर पर 13 दिनों तक खूब संघर्ष किया और अपनी जख्मों की सींचती हुई ये कहती रही की मुझें जिंदा रहना है..मुझे ज़िंदा रहना है। लेकिन उसकी इस पीड़ा से उस भगवान और उस खुदा का दिल भी पसीज़ गया और उसने उसे अपने पास बुला लिया। वो वीरा सही मायने में उस दुनिया में लौट गई जहां उसे इस कष्ट से मुक्ति मिल पाएगी और उसे वो प्यार मिल सकेगा जिसकी वो हकदार है।

वो वीरा चली गई नई दुनिया में, लेकिन अपने पीछे छोड़ गई करोड़ों लोगों के आंसू। इस वीरा को कोई नहीं जानता था, लेकिन उसके दर्द ने पूरे हिंदुस्तान को एक धागे में बांध दिया। और हर कोई कानून और समाज में बदलाव के लिए आंदोलन कर रहा है और डट कर मुकाबला करने को तैयार है। वीरा भले ही हमारे बीच नहीं है लेकिन हम सबके बीच उसकी संघर्ष की कहानी है और उसके वो दर्द हैं जो उसने सहे थे, वीरा ने ही हमें लड़ना सिखाया था और महिलाओं को उनकी सुरक्षा और सम्मान का हक मांगना सिखाया और आज वही वीरा हम से चीख चीख कर कह रही है कि मैं तो चली गई..लेकिन अब किसी और को दामिनी, अनामिका, निर्भया और वीरा मत बनने देना।
वीरा की आवाज खामोश हो चुकी है लेकिन वो कह रही है कि मुझे भूलना मत, मुझे हमेशा याद रखना और मैंने जो क्रांति की इबारत लिखी थी उसे आगे भी बुलंद करते रहना जिससे की हमारे देश में महिलाओं को सम्मान मिल सके और आने वाला वक्त भी हमें याद रखे और तुम हमें हमेशा के लिए अमर बनाए रखना। वीरा की ये आवाज़ हम सबके बीच गूंज रही है, और यही वजह है कि पूरा देश एकजुट होकर वीरा के लिए इंसाफ की मांग कर रहा है।

वीरा की मौत के बाद देश के प्रथम नागरिक प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और देश की सबसे शक्तिशाली महिला सोनिया गांधी ने भी दुख व्यक्त किया और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही। सोनिया गांधी ने यहां तक कहा कि वो एक महिला और मां होने के नाते इस दर्द को समझ सकती है, तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी तीन बेटियों का पिता होने का रोना रो चुके हैं तो शीला दीक्षित ने कहा कि उन्हे इस घटना पर शर्म भी आती है और दुख भी होता है। लेकिन बड़ी बात ये है कि जब इन्हें इस हादसे पर दुख है तो वो उस दिन सामने क्यों नहीं आए जब विजय चौक और राजपथ पर प्रदर्शनकारी लाठियां खा रहे थे, क्या देश में जुर्म के खिलाफ आवाज़ उठाना गुनाह है?

लेकिन वीरा की मौत ने पूरे हिंदुस्तान को झकझोर कर रख दिया है..और हर कोई अब आगे बढ़ कर इंसाफ के लिए आवाज़ उठा रहा है, लेकिन हमें भी अब इस जलती मशाल को बुझने से रोकना होगा जिससे कि जरुरत पड़ने पर इससे अंधियारे को दूर किया जा सके और देश में सभ्य समाज और कानून की स्थापना हो सके।
                                                                                                            (प्रभाकर चंचल)

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

हमें कब आएगी शर्म?


दरिंदों से कब मुक्त होगा समाज?
क्या हमारे देश में कानून का डर खत्म हो गया है ? क्या कानून अपनी भूमिका सही तरीके से नहीं निभा पा रहा है, क्या हमारे अंदर की इंसानियत दफ्न हो गई है और क्या आधुनिक समाज का चोला ओढ़े हमारा शरीर, दिमाग और दिल से खोखला होता जा रहा है ? ये सब सवाल इसलिए क्योंकि आज कल जो कुछ भी हो रहा है वो दरिंदगी से कम नहीं है, और ना ही इस वारदात को अंजाम देने वाले लोग इंसान हैं, क्योंकि इंसान समाज को जोड़ता है तोड़ने का काम नहीं करता, वो सिर्फ समाज के बने रीति रिवाजों का पालन करता है, ना कि इसकी परिधि को लांघ कर कालिख पोतने का काम करता है। हमारी सभ्यता और हमारे समाज ने कभी भी हमें किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं सिखाया, फिर हम हमेशा ऐसा ही क्यों करते हैं? जब हम किसी की भलाई के बारे में कुछ सोच नहीं सकते तो हमे किसी को नुकसान पहुंचाने का हक़ किसने दिया ?
देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर एक बार फिर से दरिंदगी का नंगा नाच देखने को मिला, राजधानी की एक व्यस्त सड़क पर एक चलती बस में एक लड़की की इज्जत तार-तार कर दी गई, बस में मौजूद सभी ने लड़की के दोस्त के सामने उसे अपने हवस का शिकार बनाया, और फिर दोनों के कपड़े फाड़ कर उन्हें सड़क के किनारे फेंक दिया, और जब इसकी शिकायत पुलिस के पास पहुंची तो गैंग रेप का मामला सामने आया।

जैसा कि बलात्कार शब्द ही अपने आप में एक क्रूर और मन को झकझोरने वाला और रूह को कंपा देने वाला शब्द है, इसी क्रूरता के साथ दरिंदों ने भी वारदात को अंजाम दिया। इस वारदात में पीड़ित लड़का और लड़की करीब रात के साढ़े नौ बजे फिल्म देख कर लौट रहे थे, और उन्हें द्वारका जाना था,और मुनिरका से ये एक व्हाइट लाइन बस में सवार हो गए, इसके बाद जो कुछ भी हुआ उन दोनों ने इसके बारे में कभी सोचा भी नहीं होगा। बस में सवार होने के कुछ देर बस स्टाफ ने इनके साथ अभद्र व्यवहार शुरू कर दिया, विरोध करने पर लड़के की पिटाई की गई..और उसे लहू लुहान कर दिया और फिर लड़के के हाथ पैर बांध कर वो लड़की को केबिन में ले गए औऱ फिर उसके साथ सामुहिक दुष्कर्म किया। इस बस के शीशे काले थे और उनमें पर्दा भी लगा हुआ था, और पूरी वारदात के दौरान बस के अंदर की लाइट भी बंद थी। इस पूरी वारदात को चलती बस में अंजाम देने के बाद दरिंदे लड़के और लड़की को नंगी अवस्था में सड़क के किनारे फेंक कर फरार हो गए। इन दोनों को जिस अवस्था में बस से फेंका गया उससे इन दिनों को काफी चोटें भी आई है, और लड़की के साथ वो जिस दरिंदगी से पेश आए उसे लड़की की आंत और लोअर एबडोमेन को काफी नुकसान पहुंचा है।

दरिंदे अपना काम पूरा कर फरार हो गया, लेकिन इसके बाद जो कुछ भी हुआ वो भी किसी शर्मनाक स्थिति से कम नहीं था, जाहिर है कि पुलिस मौके पर देर से पहुंची, लेकिन इस दौरान मौजूद किसी भी शख्स ने लड़के और लड़की के तन को ढंकने की कोशिश नहीं की और ना ही किसी पुलिस को सूचित करना ही मुनासिब समझा, इतना ही नहीं जब पुलिस मौके पर पहुंची तब भी किसी ने उन दोनों को उठाने में पुलिस की मदद नहीं की। वारदात के बाद सभी दोषियों को फांसी की सज़ा देने या फिर उन्हें नपुंसक बनाने की मांग कर रहे हैं, जाहिर है उनमे वो लोग भी होंगे जो उस वक्त मौके पर मौजूद होंगे। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि उस वक्त वो उनकी मदद के लिए आगे क्यों नहीं आए? ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, हर बार यही देखते को मिलता है कि आरोपी वारदात को अंजाम देकर फरार हो जाता है लेकिन इसके बाद लोग पीड़ित को घूरते हैं बजाय उसकी मदद करने के।

हर बार ऐसा ही होता है कि हम किसी भी बड़े वारदात के लिए पुलिस को जिम्मेदार बताकर अपनी जिम्मेदारियों से बच निकलते हैं, लेकिन इस वारदात के बाद हमारी जो भूमिका होती है उसे भूल जाते हैं और मूक दर्शक बने रहते हैं, यही सोचते हैं कि आखिर ऐसे पचड़े में कौन पड़ेगा? और कभी ये नहीं सोचते हैं कि हमारी सजगता से समाज का भला हो सकता है, या किसी की ज़िंदगी बच सकती है।

हर किसी के जुबान पर सिर्फ यही सवाल है कि इस दौरान बस ना जाने कितने ट्रैफिक सिग्नल और कितने ही बैरिकेडिंग से होकर गुजरी होगी, लेकिन पुलिस का इस पर ध्यान क्यों नहीं गया? इस वारदात के बाद हर कोई दिल्ली पुलिस की आलोचना ही कर रहा है, लेकिन ये नहीं सोच रहा कि जिस रोड पर चलती बस में ये क्रूर हादसा हुआ उस वक्त सैकड़ों गाड़ियां भी उस बस की बगल की गुजरी होंगी, सैकड़ों लोग पैदल भी चल रहे होंगे लेकिन उनका ध्यान भी उस ओर नहीं गया।
ऐसे सवाल खड़े कर के हर पुलिस की उनकी गलतियों का एहसास तो करा सकते हैं, लेकिन जिम्मेदारियों से भाग नहीं सकते, अगर हम हमारे समाज को सुरक्षित देखना चाहते हैं तो हमें जागना होगा और पुलिस के लिए आंख, कान और नाक बनना होगा. तभी हम पुलिस का साथ देकर ऐसे दरिंदों को समाज को बचा सकते हैं
                                                      (प्रभाकर चंचल)


शनिवार, 27 अक्टूबर 2012

चुनावों के लिए फेरबदल

लोकसभा चुनाव के पहले मनमोहन सरकार के पास अपनी छवि सुधारने का ये आखिरी मौका है...और इस बार अपनी टीम में फेरबदल कर उन चेहरों को भी लाने की कोशिश में जुटे हुए हैं जो कि पार्टी को चुनवों में फायदा पहुंचा सकते हैं...यानी ये साफ है कि मंत्रिमंडल में होने वाला ये फेरबदल चुनाव की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है...यूपीए की मौजूदा सरकार मे कुछ मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के छींटे है...तो कुछ पूर्व मंत्री आरोपों में फंस कर जेल की सज़ा भी काट चुके हैं....और अब तो सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर भी घोटालों के दाग लग चुके हैं...जिससे पूरी की पूरी यूपीए सरकार इस वक्त कटघरे में खड़ी है....और इस लिहाज से भी चुनाव के फाइनल मे पहले टीम मनमोहन का बदला जाना जरूरी लग रहा था...और यही वजह है कि समय रहते और जनता के बीच में जाने से पहले सरकार लोगों को ये संदेश देना चाहती है कि वो साख को लेकर सजग है...ऐसा नहीं है कि ये फेरबदल अचनाक हो रहा है....यूपीए नेताओं की हुई कई दौर की बैठकों के बाद सरकार इस निर्णायक मो पर पहुंची है....यूपीए टू के कार्यकाल में कॉमनवेल्थ घोटाला, टू-जी घोटाला, कोयला घोटाला जैसे बड़े भ्रष्टाचार के मामले सामने आ चुके हैं...और इससे देश के खजाने को अरबों रुपए की चपत लग चुकी है....और दूसरी तरफ से लगातार बढ़ रही महंगाई भी आम जनता को खाए जा रही है....ऐसे में सरकार उन चेहरों को आगे करना चाहती है..जिनकी छवि साफ है...और इस बहाने सरकार बार-बार कड़े तेवर अपनाने वाले विपक्ष को भी शांत करने की कोशिश भी कर रही है...इस फेरबदल में दक्षिण पर खास ध्यान है..जिससे की चुनावों के समय नाराज़ डीएमके की भरपाई हो सके...तो बंगाल में भी नेतृत्व को मजबूत करने के लिए वहां के सांसदों को कैबिनेट में शामिल किया जा रहा है..तो दूसरी तरफ युवा शक्ति को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी के चहेतों सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा औऱ ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी प्रमोशन किया जा रहा है...लिहाजा ये साफ है कि इस फेरबदल के जरिए सरकार हर वर्ग को लुभाने की कोशिश कर रही है...लेकिन देखना ये होगा की कैबनेट में चेहरों को बदलने से सरकार की सीरत बदलेगी और क्या युवाओं को शामिल करने से भ्रष्टाचार में बुरी तरफ फंसी हुई सरकार को उबरने की शक्ति मिलेगी ?...

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

ब्लैक होल


देश के लिए ब्लैक होल है
आज की ये राजनीति
जहां सब कुछ बदल जाता है
बुराई अच्छाई में, गद्दारी वफादारी में
उजाला अंधेरा में, अनपढ़ विद्वान
कांटे फूल में, गद्दारी इमानदारी में
इन रास्तों में उलझ जाता है आदमी
रास्ता खोजते खोजते चकरा कर
गिर पड़ता, लेकिन होश में आने
खुद को पाता है उसी ब्लैक होल में
जहां सब कुछ हजम हो जाता है
और धीरे-धीरे वो भी हजम हो जाता है
इस अथाह ब्लैक होल में

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

रेप स्टेट हरियाणा!

रेप स्टेट हरियाणा

एक महीने में 17 बलात्कार, ये तस्वीर उस भारत देश की है जहां नारियों की पूजा की जाती है, जहां समाज में नारियों का खासा स्थान मिला हुआ है। हमारे देश में नारियों को दुर्गा, काली, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में पूजा जाता है, और कितने इत्तेफाक की बात है कि कुछ दिनों बाद नवरात्र शुरू हो रहे हैं जब देश भर में मां दुर्गा की पूजा की जाएगी, फिर दीवाली का त्योहार आएगा जब लक्ष्मी का पूजन होगा फिर काली पूजा और फिर बसंत में सरस्वती की पूजा की जाएगी, और ये दुष्कर्म भी इन्हीं दिनों के पास हो रहे हैं। एक तरफ जहां ये दुष्कर्म हमारे समाज पर सवालिया निशान लग रहे हैं, तो दूसरी तरफ ये दिनों दिन मानव की गिरती मानसिकता का भी परिचायक हैं।
हरियाणा की पहचान जहां खेल राज्य के रूप में होती थी और इसे मेडलों का खजाना कहा जाता था, वहीं अब एक महीने में इसकी पहचान बदल गई है, हरियाणा को अब रेप स्टेट के नाम से जाना जाने लगा है, और ये मुख्यमंत्री हुड्डा की साख लगा बड़ा दाग साबित हो सकता है,खिलाड़ियों के मेडल जीतने पर ईनामों की बरसात करने वाले हुड्डा अब तक रेप की वारदातों पर काबू पाने अक्षम रहे हैं। मुख्यमंत्री साहब ने राज्य का कैप्टन होने के नाते महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात जरूर कही, लेकिन तब तक रेल गाड़ी प्लेटफॉर्म छोड़ काफी आगे निकल चुकी थी।

हरियाणा में कांग्रेस पार्टी की सरकार है और राज्य के बलात्कारी जिस्म पर सबसे पहले नमक भी कांग्रेस पार्टी ने ही छिड़का, इसकी शुरूआत की कांग्रेस की माननीय सोनिया गांधी जी ने, सोनिया गांधी बलात्कार पीड़ित परिवार से मिलने नरवाना गई थी, वहां उन्हें मुख्यमंत्री की क्लास लगानी चाहिए थी, प्रशासन को पुख्ता करने के निर्देश देने चाहिए थे, लेकिन पीड़ित परिवार से मिलने गई सोनिया को शायद इसका एहसास ही नहीं रहा कि आखिर पीड़ितों का दर्द कैसा होता है, वो सबके सामने मुख्यमंत्री हुड्डा का बचाव करती दिखीं और कह दिया की बलात्कार सिर्फ हरियाणा में ही नहीं देश में हर जगह हो रहे हैं। माना जाता है कि जब कभी भी सोनिया सामने आती हैं तो कड़े तेवर में होती हैं, यहां भी ऐसा ही हुआ, लेकिन अपनी सरकार के बचाव के लिए
सोनिया ने जो किया सो किया, राज्य के जख्मी शरीर पर दूसरा तीर दागा हरियाणा कांग्रेस के नेता धर्मवीर गोयत ने, गोयत साहब ने तो बलात्कार पर ही सवाल खड़े किए, और कहा कि यहां बलात्कार नहीं, आपसी सहमति से सेक्स होता है, और 90 फीसदी लोगों को ये बाद में एहसास होता है कि उनके साथ बलात्कार हुआ है।
बयानों का ये करवां आगे भी बढ़ा, फिर एक सज्जन ने ये कह डाला कि हरियाणा में हो रहे बलात्कार सरकार के खिलाफ साजिश है, अरे साहब आप ये क्यों नहीं सोंच पा रहे कि सरकार के खिलाफ साजिश रचने के लिए कोई भी अपने घर की इज्जत को नीलाम क्यों करेगा? हरियाणा सरकार की ये बातें इस बात का एहसास कराने के लिए काफी है यहां महिलाओं के साथ हुए बलात्कार के साथ-साथ सरकार और नेताओं की मानसिकता का भी बलात्कार हो गया है, और अगर ऐसा ही बना रहा तो वो दिन दूर नहीं जब मंत्री और नेता बयान देते रहेंगे, और चारों तरफ अराजकता पैर पसारती रहेगी।
एक तरफ जहां हरियाणा का जख्म गहरा होता जा रहा है, तो वहीं रेप का उम्र कनेक्शन तलाशने की भी कोशिश की गई और ये कहा कि अगर लड़कियों की शादी 15 साल की उम्र में कर दी जाए तो ऐसे वारदातों पर लगाम लगाई जा सकती है, लेकिन दरींदों ने इसे भी नाकाफी करार दिया, कुछ दिन बाद ही गुड़गांव में 6 साल की मासूम के साथ रेप किया गया, तो सिरसा में तीस साल की महिला के साथ। ऐसे में खापों की इस दलील के सामने ये सवाल खड़ा होता है कि क्या बलात्कारी उम्र देख कर बलात्कार करते हैं? अगर ऐसा नहीं है तो इसकी सज़ा उन्हें क्यों दी जाए जो कि पीड़ित है, उन्हें क्यों नहीं ढूंढा जाता जो दोषी है। ऐसा तो है नहीं कि बलात्कारी एलियन होते है जो कि दुष्कर्म करने आए और भी अपने यान से दूसरे ग्रह पर चले गए। वो भी हमारे ही बीच के हैं, और कोई ना कोई तो इस बारे जरूर जानता होगा कि आखिर उनके बीच वो दरिंदा कौन है, तो फिर उस पर कार्रवाई क्यों नहीं होती, इसकी सज़ा उसे क्यों नहीं मिलती, सभी फतवे महिलाओं के लिए ही क्यों जारी होते हैं?
(प्रभाकर चंचल)