रविवार, 12 अगस्त 2012

अन्ना आंदोलन बना IPL !


अन्ना आंदोलन बना IPL !
अन्ना हजारे और उनकी टीम ने जब भ्रष्टाचार के खिलाफ और जनलोकपाल के लिए जंग की शुरूआत की थी तो लग रहा था कि ये एक काफी संगठित टीम है, जो देश से भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने में अहम भूमिका निभाएगी, और इसी उम्मीद से देश के हर कोने से अन्ना हजारे और उनकी टीम को भरपूर समर्थन मिला, इतना समर्थन की अन्ना को इसकी उम्मीद भी ना थी। लेकिन टीम भंग होने भर की देरी थी और सारे विवाद खुल कर सामने आ गए। अन्ना जो कभी पार्टी बनाने के पक्ष में नहीं थे, कहा गया कि उन्होंने अपने सहयोगियों के दबाव में आकर पार्टी बनाने का फैसला लिया था। खबरें यहां तक आई कि अन्ना को अपना संदेश सहयोगियों तक पहुंचाने के लिए गांधी जी के भाषण का सहारा लेना पड़ा, यानी इससे ये साफ हो जाता है कि अन्ना और उनके सहयोगियों के बीच की दूरी बढ़ चुकी थी। अन्ना तो जनलोकपाल की जंग के सेनापति थे लेकिन उनकेनिर्देशों को नज़रअंदाज़ करते आ रहे थे। फिर अन्ना के दत्तक पुत्र माने जाने वाले अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट कर पार्टी बनाने का सारा आरोप अन्ना पर मढ़ दिया। केजरीवाल ने कहा कि पार्टी बनाने का फैसला खुद अन्ना ने लिया था, और ये फैसला किसी के दबाव में नहीं लिया गया। इसके साथ केजरीवाल की दो लाइनें और थी वो ये कि राजनिति में उतरना ही आखिरी विकल्प है और उन्हें बदनाम करने के लिए साजिश रची जा रही है। हालांकि केजरीवाल ने ये नहीं कहा कि आखिर ये साजिश कौन रच रहा है। केजरीवाल के बयान से साफ है कि अन्ना के सहयोगी अन्ना के कंधे पर बंदूक रख कर निशाना बनाने में लगे हुए हैं। अब तक जो टीम एक थी वो बंट गई। अन्ना की कप्तानी में खेलने वाले खिलाड़ी आज अन्ना के सामने खड़े हैं। ये कहना गलत ना होगा कि अब अन्ना टीम अन्ना Vs  अरविंद केजरीवाल हो गई है। भले ही टीम के दूसरे सदस्य कह रहे हों कि उनके बीच कोई मतभेद नहीं है। लेकिन किरण बेदी का ये बयान की अन्ना ने दो सुझाव दिए थे, जिसमें से एक सुझाव राजनीति में आना भी था। तो बड़ा सवाल ये है कि अन्ना के दूसरे सुझाव पर विचार क्यों नहीं किया गया, राजनीति और राजनेताओं का विरोध करने वाली ये टीम चुनाव लड़ने को क्यों तैयार हो गई? और इन सबके बीच वो हैरत में है जो अन्ना आंदोलन के समर्थक थे, उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि वो किस ओर जाएं, स्टेडियम में मैच तो खेला जा रहा है, लेकिन वो समझ नहीं पा रहे कि समर्थन किसका करे। क्योंकि उनके सामन एक ही आंदोलन की दो टीमें है, ठीक वैसे ही जैसे IPL में एक ही टीम के खिलाड़ी कई टीम में बंट जाते हैं, और प्रशंसक ये सोंचते रहते हैं कि वो खिलाड़ी को सपोर्ट करें या फिर टीम को। और ये सब ऐसे वक्त में हो रहा है जब रामलीला मैदान में योग गुरु स्वामी रामदेव मोर्चा संभाले हुए हैं। ऐसे में सवाल ये भी खड़ा हो रहा है कि कहीं ये सब रामदेव के आंदोलन की वजह से तो नहीं हो रहा, क्योंकि जिस  तरह से अन्ना आंदोलन के फेल हो जाने के बाद रामदेव ने लोकपाल का मुद्दा हाइजैक किया है वो भी अन्ना और उनके सहयोगियों के लिए चिंता का विषय हो सकता है। ठीक ऐसा ही IPL में भी होता है कि जब आपकी टीम का कोई घातक खिलाड़ी आपके ही खिलाफ खेल रहा हो तो आप भी हैरत में पड़ जाएंगे। अभी तो सिर्फ अन्ना और अरविंद का मतभेद सामने आया है, और पता नहीं आगे क्या क्या होगा? अन्ना के पुराने सहयोगी इस लड़ाई में पहले ही अन्ना का साथ छोड़ चुके है,और उन लोगों ने भी सारे आरोप अरविंद केजरीवाल पर ही मढ़ा है, यानी पहले से बंटी हुई टीम अब और बंटती जा रही। अब देखना ये होगा कि अन्ना इस पर सफाई देते हैं या फिर केजरीवाल को कदम पीछे खींचना पड़ता है।जतंर-मंतर पर जब अन्ना पहली बार जनलोकपाल के लिए अनशन पर बैठे तो उन्हें देश की साठ फीसदी से ज्यादा आबादी जानती भी नहीं थी, अन्ना तो महाराष्ट्र में अपने आंदोलनों के लिए काफी लोकप्रिय रहे हैं, और वो कई बार महाराष्ट्र सरकार की कुर्सी भी हिला चुके हैं। लेकिन अन्ना को राष्ट्रीय नक्शे पर ला कर खड़ा किया जंतर-मंतर ने। जंतर-मंतर से अन्ना के साथ तो कारवां जुड़ा वो बढ़ता चला गया और अन्ना हर एक गांव, हर एक शहर और हर एक घर में लोकप्रिय हो गए। ये कारवां रामलीला मैदान पर साथ गया और फिर जंतर-मंतर पर आकर आखिरी दिन टूट गया। अन्ना के सामने अब बड़ा सवाल ये भी है कि वो अपने इस कारवां को कैसे बचाएंगे। क्योंकि यही करवां अनशन स्थलों पर हाथ में तिरंगा लिए अन्ना की अगुवाई में अन्ना के लिए दिन-रात खड़ा था, और अन्ना भी ये कह कर उनका जोश बढ़ाते थे कि लोगों की भीड़ से उन्हें ऊर्जा मिल रही है। जीने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है, और अन्ना ने जो बीड़ा उठाया है उसे पूरा करने के लिए इस ऊर्जा की जरूरत तो होगी ही

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