शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

कोयले की आंच और हंगामों की बौछार

मानसून सत्र की तेरहवीं
जिस तरह से हंगामों के बीच और बगैर काम काज के मानसून सत्र अनिश्चित काल के लिए स्थगित हुआ है उससे शीतकालीन सत्र भी एक बार फिर से संकट और आशंकाओं के बीच जूझता दिख रहा है। विपक्ष सरकार से बातचीत करने को कतई तैयार नहीं है, ऐसे में ये कयास लगाए जा रहे हैं कि अगर सरकार ने विपक्ष की मांगें नहीं मानी तो एक बार फिर से शीतकालीन सत्र के दौरान संसद में हंगामों का कोहरा छा सकता है।
कोयले की आंच और हंगामों की बौछार, कुछ ऐसा ही बीता संसद का मानसून सत्र, सदन में काम-काज तो ना के बराबर हुआ, लेकिन सांसदों ने कोयला घोटाले की आंच तले मन भर हल्ला काटा और एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई भी कोर-कसर ना छोड़ी। नतीजा ये रहा की सत्ता पक्ष और विपक्ष को अपनी राजनीति चमकाने के पीछे देश हित का तनिक भी ख्याल ना रहा, और जिस सत्र में तीस बिल पास होने थे, वहां सिर्फ 6 बिल पास हुए और कोयला घोटाले की आड़ में देश को 10 करोड़ रुपए की चपत और लग गई, और तेरह दिन का सत्र सरकार और विपक्ष के अड़ियल रुख की भेंट चढ़ गया। लेकिन दोनों ही पक्ष को इससे भी संतोष नहीं है, सरकार बीजेपी पर समय बर्बाद करने का आरोप लगा रही है तो बीजेपी का कहना है कि जब की उनकी तीनों मांगें नहीं मानी जाएगी तब तक वो सरकार से बातचीत नहीं करेंगे, यानी शीतकालीन सत्र में फिर से सदन एक बार फिर हंगामों की रज़ाई ओढ़ सकता है और सांसद को से कंबल ओढ़ कर हीटर सेकने का एक और मौका मिल सकता है।
खैर मौनसून सत्र का जो होना था वो तो हो चुका है। अब आगे की रणनीति पर विचार करने की जरूरत है, लेकिन यहां भी सरकार और विपक्ष एक दूसरे की फूटी आंख नहीं सुहा रहे है। प्रधानमंत्री का कहना है कि विपक्ष को लोकतंत्र में आस्था ही नहीं है और विपक्ष ने सीएजी रिपोर्ट पर चर्चा कराने का मौका भी गंवा दिया। तो दूसरी तरफ बीजेपी कोलगेट की लड़ाई को सड़क पर ले जाने का ऐलान कर चुकी है,यानी विपक्ष जो ससंद में करने में कामयाब नहीं हो पाया उसे वो अब सड़क पर दोहराना चाहता है, यानी साफ है कि विपक्ष को कोयला घोटाले में पीएम के इस्तीफे से कम कुछ भी मंजूर नहीं है।यानी जब सड़क पर आंदोलन होगा तो एक बार फिर से आम जनता को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। रैली और विरोध प्रदर्शन होंगे तो सड़कें जाम होगीं, भोंपू बजेगा तो शोर गुल होगा यानी राजनीति की आड़ में कानून की मर्यादाएं तोड़ी जाएंगी और कानून के पहरेदार इसे देखते रहेंगे।
दरअसल कोलगेट के रास्ते से सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी-अपनी सियासत चमकाने में लगे हुए हैं। सरकार सदन में चर्चा इसलिए कराना चाहती थी क्योंकि इसमें बीजेपी पर भी कई आरोप लगते और फिर सरकार ताल ठोक कर विपक्ष को आड़े हाथों ले सकती थी, लेकिन विपक्ष यहां एक कदम आगे निकला और अपनी मांगों पर अड़ा रहा। यानी सदन में तू डाल-डाल, मैं पात-पात की कहानी साफ तौर से लिखी जा रही थी, और इसी अड़ियल रवैये की वजह से संसद और देश का कीमती समय बर्बाद हो गया। इस बार प्रत्यक्ष रूप में कोई घोटाला तो सामने नहीं आया लेकिन सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से ना चल पाने पर देश के खजाने को 10 करोड़ रुपए का नुकसान जरूर हो गया। विधानसभा और लोकसभा चुनाव पास आ रहे हैं ऐसे में कांग्रेस और बीजेपी जनता के बीच जाकर एक दूसरे की पोल खोलने की कवायद में जुट गए हैं। लेकिन शायद दोनों पार्टियां ये भूल रही हैं कि ये पब्लिक है सब जानती है।
प्रभाकर चंचल

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