बुधवार, 15 अगस्त 2012

ये कैसी आज़ादी


आजाद भारत 65 साल का हो गया है, और इसका जश्न भी खूब धूम-धाम से मानया जा रहा है। हर कोई कह रहा है कि हमें अपनी आजादी पर फ़क्र है और हम इसे किसी भी कीमत पर खोने नहीं देंगे। आखिर हमें स्कूल से यही तो सिखाया गया है कि हमारी आजादी हमें बेहद प्यारी है, और जान से भी ज्यादा प्यारी है, हमने महापुरुषों के संदेश में भी यही पढ़ा है।
लेकिन सवाल ये है कि क्या आज 65 साल की आजादी सचमुच में हमें अपने स्वाधीनता पर फक्र करने का अवसर देती है? क्या हमारी सरकार से हमें वो सभी जरूरी चीजें मिल रही हैं, जिसकी हमें वास्तव मे दरकार है? क्या हमें इस आज़ाद देश में आज़ादी से जीने के अवसर मिल रहे हैं है? इतना कुछ सोचने बाद जवाब होगा नहीं, क्योंकि हमें अपने इस आजाद देश में वो सभी जरूरी चीजें नहीं मिल रही, जिसकी हमें आवश्यक्ता है। आज कस्बा गांव की ओर पलायन कर रहा है, गांव शहर की ओर, शहर महानगर की और महानगर विदेशों की ओर पलायन कर रहा है, ये सभी अपनी रोजमर्रा की जरूरतें और पेट भरने के लिए ऐसा करने को मजबूर हैं, वो दस फीसदी लोग ही होंगे जो अपने व्यापार को बढ़ाने और शौक के लिए विदेशों में सैर करने जाते होंगे। अगर ये सच्चाई हमारे सामने है तो हम अपनी आजादी पर गर्व कैसे कर सकते हैं? हमारी सरकार को ये पता है कि उसकी हर प्लानिंग धीरे-धीरे फेल हो रही है, और फिर भी विद्रोह करने पर सरकार कहती है उसे लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता हासिल है।
हमारे देश की आधी से ज्यादा आबादी भूखे पेट रात गुजारने को मजबूर है, लाखों लोग तो आधा पेट ही भोजन कर पाते हैं। इस आजादी पे तरस उस वक्त आती है जब एक मासूम अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए रेड लाइट पर तिरंगा बेचता नज़र आता है, एक मां अपने गोद में बच्चा और एक हाथ में तिरंगा लिए लोगों से ये गुहार करती है कि वो उसका तिरंगा खरीद ले, जब बच्चे रेडलाइट पर अपने करतब दिखा कर लोगों से पेट भरने के लिए पैसे मांगते हैं। इतना ही नहीं, आजादी पर चिढ़ उस वक्त होती है जब एक सामान बेचने वाली युवती लोगों से कुछ सामान खरीदने की गुहार करती है औऱ मनचले उसे छेड़ते हैं और उसकी तरफ वासना भरी नज़रों से देखते है।
जब हमारे देश में रहने वालों की यही मानसिकता है तो आप सोचिए कि आखिर ये आजादी हमारे लिए किस काम की है। आजादी के योद्धाओं ने तो देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिए अपने जान की बाजी लगा दी, लेकिन लोगों और सरकार की इस कुंठित मानसिकता से हमें कौन आजादी दिलाएगा? और कब हमारी आजादी सही मयाने में पूरी हो पाएगी, और कब हमारे देश में समाज का हर तबका चैन की सांस ले सकेगा? आखिर हमें ये पूर्ण आजादी कब मिलेगी?
हमारे देश में सरकार और नेताओं को वोट बैंक की राजनीति करने से फुरसत नहीं है, बाकी बचा समय वो दौरों में निकाल देते हैं, जनता अपने स्वार्थ के पीछे भाग रही है..तो ऐसे में इस देश की सुध लेने वाला कोई नहीं है, देश हित के लिए हाल ही में कुछ आंदोलन भी हुए, लेकिन इनका मकसद भी राजनीति ही निलका। ऐसे में मन ये सोचने पर मजबूर हो जाता है कि, क्या 121 करोड़ की आबादी में कोई भी भारत पुत्र नहीं है, जो कि देश के लिए कुछ करने की मंशा जाहिर सके, और इसे पूरा भी करे। देश आज जिस दो राहे पर खड़ा है वहां से समाधान निकलना मुश्किल लग रहा है, अब समुद्र मंथन की तरह देश मंथन की जरूरत महसूस हो रही है, जिससे की देश से पाप निकल जाए और यहां सिर्फ पुन्य का ही बोल बाला हो। तो क्या आज इस युग में समुद्र मंथन की कल्पना वास्तविकता में बदल पाएगी, क्या हमारा देश घोटालों और करप्शन से आगे निकल कर विकास की नई राह को छू पाएगा?

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